एक समान स्थिति होने पर भी मनुष्य के स्वभाव में भिन्नता क्यों दिखाई देती है?

 AWGP- GURUDEV LITERATURE: Difference हमारी हर चीज में होते हैं।हम body parts को ही देखें तो वो एक समान नहीं होते हैं। Even though left right body parts भी अलग अलग होते हैं। इसलिए आजकल degital body print लेते हैं, क्योंकि वे सबके अलग-अलग होते हैं। देखने में एक जैसे दिखाई देने पर भी हैं तो अलग अलग। इसलिए digital body print की value है। जब हमारे शरीर में ही हर, cell, particles, parts में इतनी भिन्नताएं हैं तो हर व्यक्ति के स्वभाव में अन्तर आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। 



हमारे ऋषियों ने भी समय-समय पर यह सवाल उठाए हैं। चिंताएं व्यक्त करी हैं कि मनुष्य के स्वभाव में कार्यों में इतनी भिन्नताएं क्यों हैं। जैसे आज जगह जगह पर समयानुसार और आवश्यकतानुसार आयोजन होते हैं, इसी प्रकार प्राचीन काल में भी समय-समय पर सभाओं का आयोजन होता रहा है। समुद्र मंथन से लेकर विचार मंथन जैसे कोई भी कार्य हो सभी के सहयोग से कार्य होता है। समुद्र मंथन से रतन एक बार ही निकले थे, पर विचार मंथन से समय की आवश्यकता के अनुसार नित्य नए विचार समाज को मिलते हैं। 

जिनसे उस समय के अनुसार होने वाली समस्याओं का समाधान होता है। एक बार ऋषियों की सभा में इसी प्रकार के प्रश्न का उत्तर देते हुए आश्र्वलायन ऋषि ने कहा कि ईश्वर हर मनुष्य को विकास के अवसर देता है लेकिन जो व्यक्ति अपने मिले हुए कार्य को पूरे उत्तरदायित्व और साहस के साथ पूरा करता है उसे ईश्वर और अधिक जिम्मेदारियां देता है। जैसे कौरव और पांडव। लेकिन स्वार्थी व्यक्ति अकेला रहता है। 

वह नर पशु के समान है। और जिनका स्वार्थ अधिक बढ़ा हुआ होता है वो अपना अहंकार दिखाने के लिए और अधिक अनुचित काम करते हैं। लेकिन कुछ व्यक्ति अपनी इच्छाओं या महत्वाकांक्षाओं को कम रखते हैं। अपना अहंकार नहीं दिखाते हैं और अच्छे कामों में लगे रहते हैं। जैसे गांधी जी, विनोबा भावे, श्री कृष्ण, राम, बुद्ध, परशुराम जी आदि व्यक्ति मानव से महामानव बने। इन्होंने पूरे विश्व में शांति का संदेश तो दिया लेकिन सत्ता को हाथ नहीं लगाया। नारद जी तो हमेशा चलते रहते थे, रुकते नहीं थे। सबको धर्म का उपदेश देते हुए उसका उपयोग भी सिखाते थे कि चिंतन की श्रेष्ठता,चरित्र निष्ठा और शालीनता ही धर्म है। 

जैसे एक बार एक पंडितों का दल गांधी जी से धर्म के ऊपर शास्त्रार्थ करने आया। तब गांधी जी ने कहा, शास्त्र तो मैं नहीं जानता। लेकिन मानव एकता के सिद्धांत को कोई झूठ ला नहीं सकता और यही मेरा धर्म है। मैं इस पर अडिग हूं और जीवन भर रहूंगा‌ उनकी यह बात सुनकर, आया हुआ डाल वापस चला गया। ये सभी उदाहरण बताते हैं कि सबकी अपनी इच्छा और अपना काम करने के तरीके पर स्वभाव में अन्तर आता है।


मानव से कैसे बनें महामानव? 

धर्म का पालन करना आवश्यक है। धर्म के 10 लक्षण हैं। इन्हें पांच यम और पांच नियम कहते हैं। इन्हें अपनाने से पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कर्मेंद्रियों सधती हैं। पांच प्राण और पांच उपप्राण की विद्या संपन्न होती हैं। इन्हीं से पांच ऋद्धियां और पांच सिद्धियां जुड़ी हैं। इनसे ही पांच योग और पांच तप होते हैं। 

गीता के ये पांच पांडव,राम पंचायतन और शिव पंचायतन हैं। पापनाशक पंचगव्य और पंचामृत भी यही हैं। इन्हीं से मानव महामानव बनें। अधर्म दिखता बड़ा है लेकिन धर्म के आगे टिकता नहीं है। जैसे अगर कहीं अंधेरा है तो उससे डर लगता है। लेकिन हल्की सी रोशनी ही उस सारे अंधकार को खत्म कर देता है, डर को खत्म कर देता है।

 इसी प्रकार बस जरूरत होती है जनमानस के जागरण की, जागरूकता की, एक साथ इकट्ठा होने की। जैसे जब महिषासुर ने अपना आतंक फैलाया, तब देवताओं की शक्ति को इकट्ठा किया। उससे देवी प्रकट हुई और उस असुर का संहार हुआ। इसी प्रकार मानव से महामानव बनने का रास्ता बनता है।


सत्य को विवेक की आवश्यकता क्यों है?

सत्य को बोलने और समझने दोनों में ही विवेक की जरूरत होती है। क्योंकि सत्य को किस प्रकार बोला गया और किस प्रकार समझा गया।इस पर निर्भर करता है कि वह कितना सत्य है। जैसे महाभारत में महाराज युधिष्ठिर ने कहा कि अश्वत्थामा हतो। नरो वा गजो। इसे गुरु द्रोणाचार्य जी ने सुना तो अपने हथियार डाल दिए। यहां बोलने और समझने दोनों में ही अन्तर है। सत्य होते हुए भी असत्य थे, परन्तु सत्य भी थे। 

इसलिए सत्य और विवेक एक सिक्के के दो पहलू हैं। सत्य हमेशा सही सीधा होने पर भी ढका हुआ महसूस होता है। वह भ्रम, स्वार्थ और दुराग्रह जैसी कई परतों के नीचे दबा हुआ होता है। इसलिए दिखते हुए भी वह दिखाई नहीं देता है। इसके लिए विवेक बुद्धि की जरूरत है। जैसे भारतीय संस्कृति देव संस्कृति है वह सभी का हित करती है, भलाई करती है लेकिन फिर भी पश्चिमी भौतिकवाद ज्यादा उपयोगी दिखाई देता है। 

यह भ्रम है। इसी प्रकार नारी एक परिवार की धुरी है। लेकिन फिर भी दुराग्रह पूर्वक उसे स्वीकार नहीं किया जाता है। जैसे 10 व्यक्ति मेला देखने गए। घर से गिन कर चले थे कि कहीं कोई खो न जाए। जब मेला देखकर वापस आने लगे तो उन्होंने गिनती फिर आरंभ करी। सब गिनते लेकिन नौ ही मिलते। रोने लगे कि हमारा एक साथी बिछड़ गया। एक राहगीर ने सुना तो कहा मैं तुम्हारे बिछड़े हुए साथी को मिलिता हूं। 

उसने सबके सिरों पर एक-एक चपत जड़ी और गिनती शुरू करी। पूरे 10 हो गए। तो दुनिया में जीना है तो भ्रम जनजालों से बचकर जीना है और स्वयं को नहीं भूलना है। ईश्वर ने मनुष्य को तीन शरीर, पांच कोष और षट् चक्रों को ऋद्धि सिद्धि जैसी शक्तियों से सम्पन्न बनाया है। लेकिन वासना, तृष्णा और अहंता समुद्र से भी गहरे हैं। इनसे बचने के लिए व्यक्ति को कर्मयोगी बनना चाहिए। सत्य को विवेक बुद्धि से समझकर उपयोगी बनाने में ही जीवन की सार्थकता है।

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